Friday, May 1, 2009

न हो साथ कोई अकेले बढो तुम...

ये पंक्तिया बस पढिये मत उसे अपने ज़हन में भी उतरिये।

ये जीवन कोई मजाक नही है, जिसे बस जीना है
यहाँ बड़ी मुश्किलें और परेशानिया है जिसे बस पीना है
तो कोई साथ में हो या हो कुछ फर्क नही पड़ता है,
सामने अगर मंजिल हो तो आदमी अकेले भी लड़ता है।
जीवन की रहो में पड़ाव भी बहुत पड़ते है,
जो उन पडावों पर ज्यादा रुक जाते है,वो उन्ही रहो में सड़ते है।
आसमान को छूने की चाह तो सभी की होती है,
कामयाब वही होते है,जिनके दिल में कुछ करने की आग सोती है।
उस सोती हुयी आग को जगाना ही अब हमारा लक्ष है,
ये मत भूलो की हम अपनी सफलता क समकक्ष है।
इसलिए कहता हूँ............


हो साथ कोई अकेले बढो तुम, सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी

सदा जो जगाये बिना ही जगा है, अँधेरा उसे देखकर ही भगा है
वही
बीज पनपा पनपना जिसे था, घुना क्या किसी उगाये उगा है
अगर उग सको तो उगो सूर्य बनकर,
प्रखरता तुम्हारे चरण चूम लेगी

सही राह छोड़ कर जो मुडे है, वही देख कर दूसरो को कुढे है
बिना पंख तोते उडे जो गगन में, सम्बन्ध उनके गगन से जुड़े है
गगन
के विहारी गरुढ़ ही बनो तुम,
सफलता
तुम्हारे चरण चूम लेगी

जिन्हें
लक्ष से कम अधिक प्यार ख़ुद से,
वही
जी चुराकर तरसते खड़े है
अगर
जी सको तो जियो जूझ कर तुम,
अमरता तुम्हारे चरण चूम लेगी

4 comments:

MISHTY said...
This comment has been removed by a blog administrator.
MISHTY said...

Awesum yaar what a dreaming range no words to describe it's beauty .

Anonymous said...

ur the best man

parul said...

you have lots of variety so why wouldn't you try to publish this on net....

people will like your poems..